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सोमवार, 11 जुलाई 2016

वीर गुर्जरो दी. ..... आन बान शान

 
गुर्जर देश गुर्जरत्रा / Gurjar Desh Gurjartra  
वीर गुर्जरो दी. ..... आन बान शान
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गुर्जरो को अगर काश्मीर के जंगलो का "बादशाह " कहा जाये तो गलत नही होगा । ये लोग जंगलो मे ओर ऊचै - ऊचै पहाडो पर रहतै है।
अगर पाकिस्तानी हमलो ओर हद बन्दी ने इनके रास्ते सीमित न कर दिये होते तो गुर्जर लोग काश्मीर की सीमा पार करके चीन ओर तिब्बत मे पहुंच जाते ओर फिर घूमते घूमते अपने पशु धन के साथ वापस आ जाते थे ।
एक बार एक गुर्जर परिवार मुझे कोहली के पास मिला, उसके बडे बुजुर्ग ने बतलाया कि मै कई बार मगोलिया ( रूस ) तक हो आया हू।
सारे काश्मीर की आबादी 40 लाख ( पाकिस्तान समेत ) है । ओर भारतीय काश्मीर मे 10 लाख से ऊपर गुर्जर है । इतने जाबांज, दिलैर , उधोगी, परिश्रमी , हिम्मत वाले लोग जितने की गुर्जर है कशमीर मे तो क्या ? किसी ओर जगह मिलना कठीन है।
इनकी जत्थे बन्दी इतनी ठोस ओर मजबूत हे कि उसे दैख कर श्रध्दा से सिर झुक जाता है । 10 लाख गुर्जर जगह जगह बिखरे हे ऊचै -ऊचै पहाडो पर निवास करते हुये है किन्तु उन सबका नैता पथ प्रदर्शक एक है ।
3000 से अधिक गुर्जर ओर 3000 से अधिक घोडो पर सवार गुर्जर इस तरह से आ रहै थै जैसे समुन्द्र मे तूफान आया गया हो । उनके गोरै-गोरै सुन्दर चैहरे , बरफानी हवा से सुर्ख गुलाबी गाल, काली - काली बिखरी फैली हुई दाढिया ओर हवा मे उडते मैलै - मैलै चोग ऐसा मालूम होता था, जैसे तूफानी नदी को लहर आसमान मे पहुंच जाने को उछल रही है ।
सिन्धु नदी के दूसरी तरफ ( जबकि कतार दर कतार इनकी घुडसवार फोज खडी हुई थी ) मैने पहली बार इनके नैता के दर्शन किये । वह काली अचकन, सफेद सिलवार ओर गूर्जरी ढगं की खालिस पगडी पहन कर आये ।
मैरे एक प्रश्न के उत्तर मे उन्होने बताया कि यह गुर्जर फोज बख्शी साहब का ही नही बल्कि हर उस आदमी का साथ दैगी जो हिन्दुस्तान का साथ देगा ।
सन्दर्भ :---
दैनिक मिलाप, पृष्ठ - 2 नई दिल्ली
16 अक्टूबर 1953
" श्री रणवीर महोदय का आखो दैखा वृत्तान्त कशमीर मे क्या दैखा ? "

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