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मंगलवार, 5 जुलाई 2016

गुर्जर समाज में शिक्षा, सामाजिक स्तर एवं आर्थिक प्रगति की रुपरेखा- शेषराज सिंह गुर्जर

गुर्जर समाज में शिक्षा, सामाजिक स्तर एवं आर्थिक प्रगति की रुपरेखा 
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शेषराज सिंह गुर्जर
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मुझे उपरोक्त विषय पर अपने विचार लिखने के अनुरोध के लिए मैं गुर्जर समाज कल्याण परिषद, चंडीगढ़ का आभारी हूँ| विषयवस्तु पर आने से पहले कुछ पृष्ठभूमि का उल्लेख आवश्यक है| समाज को सशक्त करने के लिए तीनों कारकों शिक्षा, सामाजिक स्तर एवं आर्थिक प्रगति की आवश्यकता है परन्तु यह प्राप्त कैसे किया जाए| हमारा देश लोकतान्त्रिक गणराज्य है| लोकतंत्र की परिभाषा ही व्यक्तिगत समानता है| समानता अधिकारों की ही नहीं, समानता शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में होनी चाहिए, तभी यह लोकतंत्र बचा रहेगा अन्यथा इतिहास को देखे तो कुछ भी स्थायी नही है| मनुष्य का प्राकृतिक गुण है सम्मान प्राप्त करना| लोकतंत्र में सबकी इच्छा होती है शासक बनने की परन्तु इच्छा पूर्ण कैसे हो| लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की इच्छा से शासक नही बना जाता, शासक वर्ग शासक बनाता है| बहुत से लोग यह कहते हुए घूमते है की डॉ. अम्बेडकर ने कहा था की दलितों दीवारों पर लिखलो आपको शासक बनना है” इसमे स्पष्टीकरण है उन्होंने कहा था की “दलितों आपको शासक वर्ग बनना है, और “मैं भी आज आपसे यही कह रहा हूँ की गुर्जरों आपको शासक वर्ग बनना है, शासक वर्ग बनकर ही गुर्जर शासक बन सकते है, व्यक्तिगत रूप से नहीं|”
समाज की प्रगति हमारी इच्छा है परन्तु समाज उन्नति कैसे करे इसके लिए तीन कारक है:- [1] समाज की शिक्षा, [2] सामाजिक स्तर और [3] आर्थिक स्तर| यह तीनो एक दुसरे से जुड़े है| “देश में सामाजिक क्रांति के जनक महात्मा ज्योतिबा फूले जो गुर्जर ही हैं| जिन्हें डॉ. अम्बेडकर ने अपना गुरु माना है क्योंकि उन्होंने इस देश में सबसे पहले सामाजिक आन्दोलन की शुरुआत की जिसने प्राथमिकता शिक्षा को दी| सावित्री बाई फूले खडगे पाटिल की पुत्री को देश को पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है| हमारे सारे राजनेता भाषण देते हुए मिल जाएगे कि गुर्जरों में शिक्षा होनी चाहिए, यह अलग बात है कि जब जाट आर्यसमाजी बनकर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब हम गुर्जर सनातनी हिन्दू बनकर अपनी जमीन ब्राह्मणों को दान दे रहे थे|
शिक्षा के लिए हमने रामपुर मनीहारान, दादरी और देवधर जैसी शिक्षण संस्थाए खोली जाति के स्वयं के पैसे से| जबकि समाज अगर जागृत होता तो यह कार्य शासन से कराया जा सकता था| शिक्षा को बढ़ाने के बारे में हम सभी कहते है परन्तु कुछ तथ्य आपके सामने रखना चाहता हूँ, जिस प्रकार आज से 300 साल पहले भारत में आलू नही था, 100 साल पहले चाय और चीनी नही थी उसी प्रकार 200 साल पहले कोई स्कूल नही था, नालंदा तक्षशिला को भूल जाइए, बुद्धिज्म के समाप्त होते ही वह भी नष्ट कर दिए थे| 1815 में अंग्रेजों ने शिक्षा देने की सोची| 1820 में 4 स्कुल पूना में खोले, 1825 में महाराष्ट्र के कुछ जिलों में प्राइमरी स्कुल खोले और 1830 में ब्राह्मणों ने मनुस्मृति का हवाला देकर शिक्षा सबको देने पर आपत्ति कर दी| 07 मार्च 1835 को लार्ड विलियम आवार्ड आया कि भारत में साइंस और कल्चर की एजुकेशन सबको दी जाएगी| लार्ड मैकाले जिन्हें आज भी देश की शिक्षा का दुश्मन बताया जाता है को जिम्मेदारी दी गई1881 में सारे देश में मात्र 481 हाइस्कुल पास थे उनमे से भी 241 ब्राह्मण थे| भारत में शिक्षा पहले सबके लिए खोलने से रोका फिर संवैधानिक प्राविधान की “शिक्षा पर सबका अधिकार” को लागु नही किया और फिर शिक्षा को व्यवसायिक बना दिया| अभी देश में 32 करोड़ छात्र है जिनके लिए 37500 करोड़ रु. का बजट है वह भी शिक्षाकर लगाकर अर्थात प्रति छात्र 100 रु. प्रतिमाह प्राइमरी से पीएचडी तक का औसत खर्च है| दूसरी और विदेशों में 7.5 लाख छात्र पढ़ रहे है और प्रत्येक छात्र पर 45 लाख रु. प्रतिवर्ष व्यय आता है अर्थात् 3 लाख 37 हजार करोड़ भारत के शिक्षा के बजट का लगभग दस गुना विदेशों में खर्च हो रहा है| इस पर बेईमानी यह है की 1 करोड़ से अधिक की घोषणा करने वाले केवल 48 हजार लोग है देश में, फिर 7 लाख की फ़ीस कहा से जा रही है| यदि इस पर टेक्स 20 प्रतिशत लगा दिया जाय तो 75000 करोड़ रुपयों की आय होगी जिससे 1000 हजार नवोदय विद्यालय प्रतिवर्ष खोले जा सकते है, हमारी इच्छा है कि देश में एक छत के नीचे सबको एक समान नि:शुल्क शिक्षा दी जाए| धन की व्यवस्था गढ़ मन्दिर अखाड़ो में जमा धन से की जा सकती है|
सामाजिक स्तर समाज की उन्नति के लिए यह बहुत बड़ा कारक है| आज से हजार साल पहले हमारी जाति का विभाजन करने के बाद हमारे सम्पन्न लोग एक और नाम लेकर अलग हो गये और अपना नियंत्रण उस समय के धर्म के ठेकेदारों के हाथ में दे दिया| शेष बचे लोगों को निरंतर अपमानित किया गया और उनको सामाजिक रूप में नीचा दिखाया गया| फलस्वरूप देश गुलाम बना जो गुर्जर काल में अग्रणी देश था वह सपेरो का देश बना दिया गया| मेरी जाति उपनामों में बंटती चली गई|
सामाजिक स्तर आप स्वयम तय नही करते है वरन दूसरा समाज तय करता है| यह अलग बात है कि आप उस स्तर को घटाने या ऊपर उठाने का कार्य कर सकते है जिसमे समय लगता है परन्तु यह अवश्य समझ लेना चाहिए की सामाजिक स्तर व्यक्तिगत नही जातिगत होता है|
आरक्षण donation नही compersation है जो क्षति मनुस्मृति के माध्यम से शिक्षा पर प्रतिबन्ध एवं सामाजिक अपमान के द्वारा की गई है आरक्षण इसका compersation है| मनुस्मृति को पुनः प्रत्येक क्षेत्र में स्थापित किया जा रहा है| शिक्षा संस्थानों का भगवाकरण किया जा रहा है| यदि हमारे छात्रों के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया ना अपनाया जाए तो हमे 10 साल बाद किसी आरक्षण की आवश्यकता नही रहेगी, 2016 से पहले upsc की टॉपर आरक्षित श्रेणी की लडकी बनेगी यह कोई आशा नही करता था|
तीसरा कारक जो पहले दो कारक शिक्षा एवं सामाजिक स्तर से प्रभावित होता है वह आर्थिक स्तर है| यदि गुजरात को छोड़ दिया जाय, जहा पर देश का दुनिया के साथ कारोबार आरम्भ हुआ और वहाँ पर गुर्जर भाई व्यापारी बन गए| अधिकांश भारत में गुर्जर कृषि एवं पशुपालन पर आश्रित रहे है| समाजमे अशिक्षा के कारण इस क्षेत्र का निरंतर शोषण हुआ है| स्वतंत्र भारत की सभी सरकारों ने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की है| कृषि क्षेत्र की कीमत पर उद्योग को बढ़ावा दिया गयाहै| जिस देश की दो तिहाई आबादी कृषि पर निर्भर है, उस देश में कृषि का बजट प्राविधान 0.65 प्रतिशत है| जितना 67 वर्ष में कृषि पर खर्च किया गया है उसका 5 गुणा धन उद्योग में डूब गया है| आज भी वर्तमान सरकार सारी दुनिया में उद्योग के लिए भीख मांग रही है| जबकि देश की 48 करोड़ श्रमशक्ति का 10 प्रतिशत ही उद्योग में लगा है वह भी मजदूर के रूप में शेष 67% कार्यबल कृषि पर निर्भर है और चाहे जितना ढोल पीटे जब तक कृषि क्षेत्र विकास नही करेगा, देश की अर्थव्यवस्था ठीक नही हो सकती है|
आज कृषि घाटे का सौदा बन कर रह गई है| सिंचाई की उचित व्यवस्था न होने के कारण तथा उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध न होने के कारण कृषि विकसित नही हो सकती है| भंडारण की व्यवस्था न होने के कारण तो किसान की ख़राब हालत के लिए जिम्मेदार है ही परन्तु ख़राब हालत के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार कृषि उपज के ऊपर दलाली है| संसार भर में बिक्री मूल्य का 25 प्रतिशत से अधिक दलाली नही होती है परन्तु भारत में 67 प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक दलाली होती है| जिस व्यवस्था में हमारा भविष्य अंधकारमय है उसके समर्थन में हमारे समाज के स्वार्थी तत्व देशभक्ति का नारा देकर देश के सच्चे देशभक्त किसान का शोषण कर आत्महत्या के लिए मजबूर कर रहे है| दो उदाहरण है दाल और प्याज अधिकांश लोगों ने दाल की दरो पर चर्चा की होगी, सबने अपने विचार विमर्श में यह कह कर इतिश्री कर ली होगी की दाल के मामले में केंद्र सरकार नाकाम रही है और कालाबाजारीओ ने धन कमाया परन्तु तह में जाने पर पता लगता है कि कालाधन किस प्रकार हमे खा रहा है| 2200 करोड़ किलो दाल वर्षभर में देश में खपत होती है| 1 रु. के लाभ से 2200 करोड़ का लाभ और 10 रु. से 22000 करोड़ का लाभ और 100 रु. के फायदे से 2 लाख 20 हजार करोड़ का लाभ दलाल कमाते है| इसी तरह प्याज़ आज 1 रु. की किलो किसान से खरीदी गई है| वर्षाकाल में 70 रु. किलो तक बिकेगी 70 गुना कीमत पर| 2026 करोड़ किलो प्याज़ खपत होती 60 रु. किलो के लाभ से 1 लाख 23 हजार करोड़ का लाभ दलाल कमाते है| डिफैंस को छोड़ते हुए भारत सरकार का सभी योजनाओ को मिलाकर विकास का बजट 4 लाख 50 हजार करोड़ का है इसका 75 प्रतिशत 3 लाख 43 हजार करोड़ तो दाल और प्याज में ही दलाल खा जाते है, यदि इसमें टमाटर भी जोड़ दिया जाए तो भारत सरकार के विकास के बजट के बराबर हो जाता है| हम और हमारे नेताओ को यह बात समझ ही नही आती है जब तक कृषि ठीक नहीं होगी कुछ भी ठीक नही होगा, मुक्त व्यापार नही हमे दलाल व्यापारी मुक्त कृषि चाहिए| दलालो से मुक्ति के लिए कृषक को दलालों के उपर निर्भरता को समाप्त करना आवश्यक है जो कृषि उत्पादों की मार्केटिंग किसानों को देकर की जा सकती है| सहकारिता मार्केटिंग एक समाधान हो सकता है| इसके अतिरिक्त कृषि को प्राथमिकता देनी होगी उद्योग को प्राथमिकता जापान जैसे छोटे देश में सही हो सकती है भारत में नहीं|
जब तक हम अपने समाज को शिक्षा, सामाजिक स्तर एवं आर्थिक स्तर की तथ्यात्मक जानकारी देकर जागृत कार्यकर्ता नही तैयार करेंगे तब तक हम अपने समाज और देश का भला नही कर सकते, स्वार्थी नेताओ में समाज का सम्मान देखना बंद करना होगा, जो नेता समाज का भला नही सोचता वह समाज को अपने पद प्राप्ति से सम्मान नही दिला सकता है और यह कार्य संगठित समाज ही कर सकता हैं| संगठन अपने में किसी को निश्चित अवधि के लिए नेतृत्व देकर यह कार्य करा सकता है इसका उल्टा नही की नेता पहले फिर संगठन| हमारी सारी चिंता आने वाली पीढ़ियों के लिए है इसलिए युवाओं को अपनी भावी पीढ़ियों के लिए आगे आकर नेतृत्व संभालना चाहिए|
शेषराज सिंह गुर्जर
ग्राम- मवीकलां, जिला- सहारनपुर [उत्तर प्रदेश] 

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