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रविवार, 30 जुलाई 2017

अशोक चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल डीसीएस प्रताप

श्री लेफ्टिनेंट कर्नल डाल चंद सिंह प्रताप का जन्म पीलवान गोत्र के गुर्जर परिवार में लालपुर गाँव, मेरठ, उत्तर प्रदेश के श्री लखपत सिंह जी के यहाँ 4 जुलाई 1925 को हुआ। मेरठ कॉलेज, मेरठ से आपने शिक्षा प्राप्त की। खेलकूद का शौक प्रारम्भ से ही था। सीधे सैनिक अफसर चुने जाने पर उन्होंने डिफेंस सर्विस स्टाफ कॉलेज से 1955-1956 में शिक्षा प्राप्त की। आपको 19 नवम्बर 1944 को कमीशन मिला था। 5 मई 1957 में नागा हिल पर मुठभेड़ में साहस प्रदर्शित करते हुए घायल हुए। 9 अप्रैल 1959 में राष्ट्रपति द्वारा अशोक चक्र दिया गया।

श्री लेफ्टिनेंट कर्नल डाल चंद सिंह प्रताप अशोक चक्र प्राप्त करने वाले पहले गुर्जर थे। सदा से जीवन में आशा, उत्साह, और साहस का अपूर्व सामंजस्य स्थापित करते हुए आपने वीरता की जो मिसाल कायम की वह देश भर के गुर्जरों के लिए गौरवपूर्ण है।

9 अप्रैल 1959 को सांय काल 4 बजे दरबार हाल अलंकरण समारोह, राष्ट्रपति भवन में श्री लेफ्टिनेंट कर्नल डाल चंद सिंह प्रताप, 5 गोरखा राईफल्स को राष्ट्रपति द्वारा सेना का महत्वपूर्ण सबसे बड़ा पदक - अशोक चक्र (द्वितीय श्रेणी) दिया गया। इस अवसर पर निम्न वाचन पढ़ा गया-

25 मई 1957 को नाग़ा पहाड़ियों के चिशिलिमी चेशोलिमी क्षेत्र में 5 गोरखा राईफल्स, मेजर डाल चंद सिंह प्रताप की कमान में संक्रिया में लगी हुई थी। इस कंपनी का करीब 100 उपद्रवियों से मुकाबला हुआ जो मशीनगनों और टौमी तथा स्टेन गनों और राईफल्स से सुसज्जित थे। रास्ते में पास ही ऊपर उठी हुई जमीन में वे लोग अच्छी तरह छिपे हुए थे और उन्होंने 20 गज के फासले से फायर करना शुरू किया। हल्की मशीनगन का एक विस्फोट मेजर प्रताप की दाहिनी जाँघ में लगा। आपने घावों की प्रवाह ना करते हुए हमला किया और उपद्रवी गनमैन को मार गिराया। ठीक उसी समय दूसरी हल्की मशीनगन से मेजर प्रताप पर बायीं ओर से फायर आरम्भ हुआ जो उनसे 30 गज के फासले पर थी। इस फायर से उनके चेहरे और सीने पर गोली लगी जिससे वे बुरी तरह घायल होकर गिर पड़े।

यद्यपि मेजर प्रताप इस प्रकार घायल हो चुके थे फिर भी उन्होंने अपनी पिछली प्लाटून को आदेश दिया कि वह एक तरफ से उपद्रवियों पर हमला करें। उनकी कंपनी ने उनकी वीरता और साहस से प्रेरणा लेते हुए इतने विश्वास के साथ उपद्रवियों पर हमला किया कि वे पीछे हटने पर मजबूर हुए। कंपनी के दो सिपाही हताहत हुए जिनमे से एक मेजर प्रताप स्वयं थे, जबकि कंपनी ने 10 उपद्रवियों को हताहत किया।

मेजर प्रताप का वीरतापूर्ण नेतृत्व और व्यक्तिगत साहस उनके जवानों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बना|

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