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रविवार, 30 जुलाई 2017

गुर्जर संस्कृति एक अध्ययन


मध्य कालीन भारत मे राजकीय दृष्टि से प्रबल ओर सांस्कृतिक दृष्टि से समर्थ गुर्जर साम्राज्य अस्तित्व मे आये है,  पर इनकी राजधानियाॅ बदलती रही है कितनी ही बार तो समसामयिक दो राजधानियो के बीच दूरी बदलती रही । इससे गुर्जर संस्कृति के फलने फूलने का सुअवसर प्राप्त हुआ । उस समय के गुर्जर देश ओर गुर्जर साम्राज्यो की बात करते समय गुजरात की वर्तमान सीमाओ का विस्मरण कर देना चाहिये । श्री माल - भिन्नमाल (भीनमाल ) ओर कन्नौज  -- ये दोनो गुर्जर साम्राज्य के प्राचीनतम केन्द्र थे -- एक राजस्थान मे दूसरा उत्तर प्रदेश मे । इस समय सम्राटो ओर उनके मांडलिको के दरबारो से सबंधित विद्वान एवं कवि साहित्य ओर विधा के प्रचार मे महत्वपूर्ण साधन थे । शक्तिशाली गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य ने भी राज्य दरबार मे प्रयुक्त बोली को यदि उतेजन दिया हो तो कोई आश्चर्य की बात नही । श्रीमाल के निकट जालोर मे प्राकृत महाकथा "कुवलयमाला "  ( ईस्वी सन --778  ) लिखने वाले उधोतनसूरि ने अपभ्रंश की बहुत आत्मीयता से प्रंशसा की है ओर अपभ्रंश साहित्यिक गध का प्राचीनतम उपलब्ध उदाहरण प्रस्तुत किया है । गुर्जर राजा के कवि समाज मे,  अपभ्रंश के कवियो का  केसा सम्माननीय स्थान था  , कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार राजा महेन्द्र पाल के गुरू राजशेखर  ( ईस्वी सन  880-920 )  ने अपने "काव्य मिमांसा" मे निर्देश किया है । मिथिला ओर बंगला के कवि भी अपनी मातृभाषा को त्याग,  " अवहट" ( स• अपभ्रंश ) मे काव्य रचना करते  , इस बात का स्पष्टीकरण किसी दूसरे ढंग से नही दिया जा सकता है । इस भांति प्रतिष्ठित बनी हुई यह कवि भाषा,  जो बाद मे आर्य भारत मे सर्वत्र फैली,  यह तथ्य उपलब्ध अपभ्रंश साहित्यिक कृतियों द्धारा इतना प्रत्यक्ष है कि इसके लिए किसी दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नही रहती ।

श्री माल ओर कन्नौज के पश्चात गुर्जरो की दो विख्यात राजधानियाॅ थी -- पश्चिम भारत मे चोलुक्य अथवा सोलंकी वंश की अणहिलवाड पाटण ओर मध्य भारत मे परमार वंश की धारा नगरी । गुजरात मे मूलराज , सिद्धराज जयसिंह ओर कुमारपाल जैसे तथा मालवा मे मुंज ओर भोज जैसे प्रतापी ओर विधाप्रेमी गुर्जर राजा हो गये है । दोनो केन्द्रो की राजकीय महत्त्वकांक्षाएॅ परस्पर विरोधी होते हुये भी,  दोनो गुर्जर राज्यो के सांस्कृतिक,  धार्मिक ओर साहित्यक प्रवाह समानान्तर ही नही,  सम्पूर्णतया एक थे । उस समय दोनो गुर्जर राज्यो की लोकभाषा  का माध्यम बोलीगत अंतर को छोड एक ही था । कदाचित इसलिए ही,  अपभ्रंश की सर्वाधिक रचनाऐ ईसी गुर्जर  प्रदेश की है । जो लोकभाषा  हो वही कवि भाषा हो-- साहित्यिकारो के लिये यह एक असामान्य बात है । विशेष उल्लेखनीय वस्तु तो यह है कि गुर्जर अपभ्रंश मे काव्य रचना की प्रणाली इस गुर्जर प्रदेश मे अर्वाचीन काल तक  ( सोलहवी - सत्रहवी शताब्दी तक ) प्रवहमान रही है ।

गुर्जर प्रजा वायव्य प्रदेश से पंजाब मे होकर भारत के अन्य प्रदेशो मे फैली । गुर्जरो की कितनी ही शाखाओ ने राजस्थान मे रूक कर ओर वहा से आगे बढकर गुजरात मे प्रवेश किया । दूसरी कितनी ही शाखाएँ पंजाब से मत्स्य प्रदेश ओर मालवा मे होकर गुजरात मे आई । विशेष कर पंजाब ओर वायव्य सीमा की ओर के गावो कै नामो के साथ गुजरात के स्थल नामो का साम्य,  ध्यान आकर्षित करे जेसा है । उदाहरण के लिए अफगानिस्तान का कंदहार ( सस्कृत गांधार ) ओर गुजरात का गंधार ।
पंजाब का सियालकोट ओर गुजरात का सियालबेट ।
पंजाब का अंबाला ओर गुजरात के चणास्मा के पास अंबाडा । कशमीर का श्रीनगर ओर गुजरात मे पोरबंदर के पास श्रीनगर  । रोहतक के पास योधेयो की प्राचीन राजधानी बहुधान्यक ओर गुजरात के कामरेज के पास का बहुधान  । पंजाब का गुजरांवाला , गुजरात जिला ओर गुजरसिंह तथा अपने गुजरात प्रान्त ओर गोजारिया ( गुजरिया ) आदि का साम्य इस बात का खूब सूचक है । इन गुर्जरो की मूल भाषा का स्वरूप क्या होगा ओर इसका शब्द भंडार गुजरात ओर राजस्थान की "मारू -गुर्जर" भाषा मे कितने अंशो तक स्वीकार किया होगा,  निश्चित रूप से नही कहा जा सकता है । परन्तु विशेष कर पशुपालन,  कृषि,  शस्त्रास्त्र,  कारीगरी,  पशु -  पक्षी - सृष्टि सबंधित कितने ही शब्द गुर्जरो की भाषा से आये होगे । गुर्जरो की भाषा का छोटा सा शब्द भंडार भी यदि निश्चित रूप से एकत्रित किया जा सके ओर इस प्रकार के प्रमाण कदाचित प्राप्त हो जाये तो भाषा , इतिहास ओर सस्कृति पर इससे अभिनव प्रकाश पडेगा,  इसमे कोई संशय नही ।
गुर्जरो के इतिहास  ओर सस्कृति के अध्ययन मे हमको गुजरात ओर राजस्थान विशेष कर पश्चिमी राजस्थान को एक इकाई गिनना चाहिये इसके साथ गुर्जरो का मालवा के साथ के सबंधो को भी ध्यान रखना चाहिये ।
मध्य काल मे मारू - गुर्जर प्रदेश की भाषाकीय ओर साहित्यिक एकता एक निश्चित ओर वास्तविक तथ्य है तथा इस प्रदेश मे रचित सेकडो साहित्य कृतियों की हस्तप्रतियाॅ इसके समर्थन स्वरूप विधमान है इसको विद्धवानो ने सर्वत्र स्वीकृत किया है । डा• तैस्सितोरी जिसे "पश्चिमी राजस्थानी " कहते है वह प्राचीन "गुर्जरी" है  ।
गुजरात ओर राजस्थान के प्राचीन  साहित्य को हिन्दी अथवा "प्राचीन हिंदी " मानने की प्रवृत्ति विस्तृत होती जा रही है,  इसमे भाषाकीय प्रामाणिकता का अंश मात्र भी नही है ऐसा हिंदी के नये विधार्थीयो ओर पाठको मे यह विचार गतानुगतिकता से विस्तृत होता जा रहा है । बार -बार कहा गया है कि राजस्थानी हिंदी की बोली नही है ओर गुजराती तो है ही नही । ( फिर भी हिंदी के एक प्राध्यापक द्धारा लिखी हुई एक पुस्तक मे गुजराती हिन्दी की बोली है -- ऐसा निरर्थक कथन देखा है ) उन्नीसवी शताब्दी तक राजस्थानी का साहित्य  गुजराती ( गुर्जर अपभ्रंश ) जितना ही हे - प्रत्युत अनेक राजाओ के प्रश्रय  से कदाचित इससे भी समृद्ध था । अर्वाचीन काल मे राजस्थानी के साहित्य का निर्माण  ( खेडांण) रूक जाने के कारण तथा शिक्षा ओर सरकारी कार्य क्षेत्र मे हिन्दी के प्रयोग के कारण राजस्थानी भाषा कुम्हला गई ओर अपर्याप्त पोषण तत्वों का जो स्वाभाविक परिणाम होता है,  वह धीरे - धीरे आ रहा हे  खडी बोली पर निर्मित हिंदी "अकारान्त" है । भाषा के अध्ययन मे यह अंतर है तो अत्यंत महत्वपूर्ण है । गुजरात मे प्राचीन काल मे निर्मित साहित्य ब्रजभाषा का है । संशोधन अर्थात सत्य की खोज । संशोधनो का कर्तव्य है तथ्यो की सम्पूर्ण परीक्षा के पश्चात सत्य की प्रतिष्ठा करना । हिंदी के विद्धवानो से विनती है कि हिन्दी शब्द का भूतकाल मे आरोपण  ( Projection ) न करे । दो सो वर्ष से पूर्व के किसी भी  ग्रन्थ मे इस भाषा के लिये हिन्दी शब्द का प्रयोग हुआ हो तो उसे देखने ओर जानने के लिये उत्सुक है । मारू -गुर्जर फागु ओर  रास,  यह हिंदी ????  तुलसी दास की अवधी है,  यह हिंदी ??? विधापति की परम्परा के कवियो की मैथिली - यह हिंदी ओर रीतिकाल के कवियो की ब्रज,  यह भी हिंदी? ???
इसके परिणाम स्वरूप तो विधार्थीयो ओर अभ्यासियो मे भ्रम ही उत्पन्न होता है ।
सत्य का हनन होता है ओर शिक्षा,  हिंदी अथवा देश को लाभ नही होता है ।
गुर्जरो की भाषा ओर सस्कृति उन्नत तथा ऐतिहासिकता की दृष्टि से प्राचीन काल से ही मोलिकता की कसोटी पर खरी है ।

सन्दर्भ :---
1-- गुर्जर इतिहास ओर सस्कृति -- कुछ विचार  ( अनुवादक --श्री  भूपति राम साकरिया )
{  डा• भोगीलाल साडेसरा -- Director,  Oriental Research Institute & Prof and Head of the Deptt.  of  Gujrati,  M.S. University of Baroda --- के मुद्रित भाषण का हिन्दी अनुवाद }
2-- मरू भारती - अंक -4, वर्ष- 1967

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