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शनिवार, 19 अगस्त 2017

24 अगस्त को मिहिरोत्सव मनाएगा गुर्जर समाज: बिटटू कसाना जावली


24 अगस्त ..... " मिहिरोउत्सव "

किसी भी समाज के लिए उसके इतिहास का महत्व अमूल्य है। एक गौरवशाली इतिहास की उपेक्षा कर कोई भी राष्ट्र या कौम उन्नति नहीं कर सकती।यदि किसी राष्ट्र को सदैव अधःपतित एवं पराधीन बनाये रखना हो ,तो सबसे अच्छा उपाय यह है कि उसका इतिहास नष्ट कर दिया जाये | जो जाति अपने पूर्वजों के श्रेष्ठ कार्यों का अभिमान नहीं करती तो समझ लीजे वो अपने पतन की तरफ अग्रसर है !!!

जिस परिवेश में नौकरी करता हूँ वो आपको ' जातिवाद ' से दूर रखता है और रहा भी हूँ ... हर धर्म और जात को पूरा सम्मान दिया है | फेसबुक एक ऐसा प्लेटफार्म भी हैं जहाँ आप अपने मन की बात को रख सकते है | गुर्जर बिरादरी में पैदा होने का अभिमान था , है भी और रहेगा भी !!!

आज तक किसी अन्य को नीचा दिखाना सोच में भी नही रहा है ... बस हमे अपनी ' खुदी ' को बुलंद करना है | इस लेख के माध्यम से मैं गुर्जर साथियो को अपने पूर्वज महान गुर्जर सम्राट मिहिरभोज के सन्दर्भ में अवगत कराना चाहता हूँ जिससे आपको अपने महाप्रतापी पूर्वज के बारे में ज्ञान हो सके... जिन्हें पहले से ही हैं वो रिफ्रेश कर सकते है और अगर कही पर ऐताहासिक तथ्यात्मक त्रुटि है उसे मुझे बतलाये |

भारतीय इतिहास में 750 AD से लेकर 1000 AD के दरमियान तीन साम्राज्यों का प्रमुखता से उल्लेख मिलता है | पहला ' पाल वंश ' , दूसरा " गुर्जर प्रतिहार वंश " और तीसरा ' रास्त्रकूट वंश ' | " गुर्जर प्रतिहार राजवंश "  की एक शाखा, जो मालव में आठवीं शताब्दी के प्रथम भाग से शासन करती रही थी, इसका सबसे प्राचीन ज्ञात सम्राट् नागभट प्रथम था, जो अपने मालव राज्य को सिंध के अरबों के आक्रमणों से बचाने में सफल हुआ था।

आठवीं शताब्दी के अंतिम भाग में इस वंश के राजा वत्सराज ने गुर्जरदेश राज्य को जीत लिया और उसे अपने राज्य में मिला लिया। उसके पश्चात् उसने उत्तर भारत पर अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिये बंगाल के पालों से अपनी तलवार आजमाई। उसने गंगा और यमुना के बीच के मैदान में पाल धर्मपाल को परास्त कर दिया, और अपने सामंत शार्कभरी के चहमाण दुर्लभराज की सहायता से बंगाल पर विजय प्राप्त की, और इसी प्रकार वह गंगा के डेल्टा तक पहुँच गया।

वत्सराज का पुत्र तथा उत्तराधिकारी नागभट द्वितीय, सन् ८०० ई. के लगभग गद्दी पर बैठा था। नागभट द्वितीय का पौत्र सम्राट मिहिर भोज ' गुर्जर प्रतिहार वंश ' का सबसे महान् सम्राट् समझा जाता है उसके राज्यकाल में प्रतिहार राज्य पंजाब और गुजरात तक फैल गया। भोज बंगाल के पालों, दक्षिण के राष्ट्रकूटों और दक्षिणी गुजरात से लड़ा, और उतर भारत के हृदय " कन्नोज " पर सदैव अपना दबदबा बना कर रखा |   

मिहिरभोज के बारे में इतिहासकार कहते है कि उसके साम्राज्य में उस वक़्त 1,800, 000 गाँव /शहर थे और ये लगभग 2000 KM लम्बा व् चौड़ा था | मिहिरभोज की सेना में 4 डिवीज़न थी और हर डिवीज़न में लगभग 8/9 लाख सैनिक थे | और उस वक़्त उनके पास 2000 हाथी भी थे | चूँकि राजा , भगवान् विष्णु के उपाशक थे तो उन्हें ' आदिवराह ' भी कहा गया है | और इस तरह से मिहिरभोज , उज्जैन के परमार वंश के बाद के एक राजा भोज से अलग एक शक्शियत रहे है |

दोस्तों , आने वाली 24 अगस्त को आपके महान प्रतापी गुर्जर सम्राट मिहिरभोज जी की जयंती है | तो आईये मिलकर अपने " बुड्ढे " के 1201वे प्रकाश उत्सव को " मिहिरोउत्सव " के रूप में मनाये और गौरवानित महसूश करे |  अगर संभव हो सके तो ... नीचे दिये गये पिक को अपना प्रोफाइल पिक बना कर अपने महान व् प्रतापी पूर्वज को सम्मान प्रदत कीजे |

आभार व् नमन |

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