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बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

दीपावली पर पूर्वजों का तर्पण: भंवरलाल गुर्जर एडवोकेट

राजस्थान मध्यप्रदेश के गुर्जर समुदाय में अपने पुर्वजो के श्राद्व की अन्य जातियो से अलग अनुठी परम्परा प्रचलित है जिसे गुर्जर में छांट के नाम से जाना जाता है जिसका आयोजन दिपावली के दिन सामुहिक रुप से होता है परम्परा के अनुसार गुर्जर समुदाय के पुरुष सदस्य दिपावली की अमावस्या के दिन पुरे गांव के व्यक्ति जिसमे गुर्जर समुदाय के व्यक्ति ही सम्मिलित है सामुहीक रुप से एकत्रित होकर जलाशय के किनारे जाकर अपने पुर्वजो का तर्पण करते है गुर्जर समुदाय की यह अपने पुर्वजो के श्राद्व की विधि है इसमे सामुहीक रुप से सभी लोग एक साथ पुर्वजो को याद करते हैं तथा एक लम्बी पंक्ति में जलाशय में जलीय जीवो को खाद्य सामग्री अर्पित कर पुर्वजो को उक्त पुण्य समर्पित कर शान्ति की प्रार्थना करते है विशेष यह है कि इस दौरान पहली बार किसी परिवार के नवागत सदस्य के पंक्तिबद्ध होने पर उस परिवार द्वारा गुड की भेली बांटी जाती है यह एक प्रकार से नये सदस्य का परिचय होता है,इस श्राद्व विधि को गुर्जर समुदाय में छांट के नाम से जाना जाता है यह परम्परा गुर्जर समुदाय में प्रचलित है जो राजस्थान ओर मध्यप्रदेश के गुर्जर समुदाय द्वारा ही अपनाई जाती है इन दो प्रदेशों के अलावा युपी दिल्ली हरियाणा हिमाचल प्रदेश जम्मू कश्मीर गुजरात और महाराष्ट्र में अन्य जातियो की भांति ही श्राद्व किये जाते हैं! "
गुर्जर समुदाय में छांट की परम्परा क्यो?
इस सम्बन्ध में यह कारण  प्रचलित है
इसका कारण यह माना जाता है ,वर्तमान राजस्थान प्रांत के विख्यात हिन्दू तीर्थ स्थल पुष्कर जिसे पोखर जी गुर्जर जो चेची गोत्र ने बसाया था जिसके प्रथम शासक पोखर जी ही थे से जुड़ी हुई है !
पोखर जी गुर्जर के एक पुत्री थी जिसका नाम गायत्री था एक बार भगवान ब्रह्मा जी ने विश्व कल्याण के लिए यज्ञ करने का विचार किया यज्ञ करने हेतु पृथ्वी में ऐसे स्थान का चयन करना था जो पृथ्वी का मध्य भाग हो और पृथ्वी का मध्य भाग पुष्कर सरोवर था जिसे उस समय पोखर जी की नाडी के नाम से जाना जाता था जिसमें पोखर जी की गायें पानी पिया करती थी अभी भी पुष्कर सरोवर को धरती का मझ कहा जाता है कथा के अनुसार पुष्कर सरोवर में ब्रह्मा जी और उनकी पत्नी सावित्री जो जोडे से हवन करना था सम्पुर्ण विधि पुर्ण होने के बावजूद सावित्री जी यज्ञस्थल नहीं पहुंची जबकि ब्रह्मा जी यज्ञ कार्यक्रम में अपना स्थान गृहण कर चुके थे विधि के अनुसार यज्ञ सम्पन्न हुए बिना ब्रह्मा जी का यज्ञ स्थल से उठना अनहोनी को आमंत्रण था और यज्ञ सम्पन्न होना भी आवश्यक था बहुत देर तक प्रतिक्षा करने के बावजूद सावित्री जी नहीं पहुंची जबकि यज्ञ के निर्धारित मुहर्त निकल रहा था ऐसे में यज्ञ स्थान के पास अपनी सहेलियो के साथ गांये चरा रही पौखर जी गुर्जर की बालिका गायत्री को यज्ञ सम्पन्न करने हेतु उपयुक्त मानते हुए ब्रह्मा जी ने शास्त्र विधि से अपनी पत्नी मानकर अपने वामांग बिठाकर यज्ञ सम्पन्न कर लिया जैसे ही यज्ञ सम्पन्न हुआ सावित्री जी यज्ञ शाला में पहुंच गई और ब्रह्मा जी के वामागं गायत्री को देख कर क्रौधित हो गई तथा गायत्री के द्वारा अपने अधिकारो में अतिक्रमण मानते हुए बिना सोच विचार दिए आवेश में आकर गायत्री को वंश के विनाश का श्राप दे दिया, सावित्री जी के द्वारा दिए गए श्राप से गायत्री जी व्याकुल हो गई और रोने लगी और सावित्री जी से अनुनय विनय करने लगी की मेरा कोई दोष नहीं है और मेरे वंश को श्राप से मुक्त किया जावे परन्तु सावित्री ठस से मस नही हुई सावित्री जी के द्वारा किये गये अमानवीय व्यवहार से दुखी गायत्री को बहुत पीडा हुई तथा उन्हौने ईश्वर को साक्षी मानकर  स्वंय के निर्दोष निष्कलंक होने की घोषणा करते हुए क्रौध में आकर सावित्री जी श्राप दिया कि हे सावित्री जी मै पुर्णत: निर्दोष हुँ और तुमने बिना परिस्थिति को जाने क्रौध के वशीभूत होकर मेरे वंश के विनाश का मुझे श्राप दिया है जो प्रतिकार की भावना उद्घाटन हैं इसलिए मैं तुम्हें श्राप देती हूँ की इस सम्पुर्ण संसार में तुम्हें कोई आदर सम्मान नही मिलेगा तुम्हारी कहीं पुजा नही होगी तुम्हारी सम्पुर्ण कीर्ति का विनाश होगा!
गायत्री के द्रारा दिये श्राप के कारण सावित्री जी घबरा गई और  गायत्री जी से क्षमा मांगने लगी तथा कहा कि हे गायत्री मेरे मुखारविन्द से क्रौध के वशीभूत अचेतन अवस्था में प्रवाहीत शब्द भी मिथ्या नही हो सकते हैं इसलिए मैं तुम्हारे वंश की वृद्धि का उपाय बताती हुँ इस उपाय का पालन करने से तुम्हारे वंश की वृद्धि और समृद्धि और कीर्ति में दिन दुनी और रात चौगुनी बढोत्तरी होगी
हे गायत्री तुम्हारे वंशज अपने पुर्वजो का सामुहीक रुप से इस पुष्कर सरोवर में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के तर्पण करेगे तो निश्चित ही काल तुम्हारे वंशजों से दुर रहेगा और  प्रत्येक वर्ष तुम्हारे वंश में निरन्तर वृद्धि होगी इस पर गायत्री जी ने भी आवेश में आकर सावित्री जी को दिये गए श्राप के कारण आत्मग्लानी प्रकट करते हुए उन्हें श्राप  आंशिक मुक्त करते हुए कहा कि हे माते मेरे निर्दोष मन ने आवेश में आकर प्रताड़ित कर श्राप दिया है अतः मेरे मुख से निकले हुए शब्द सदैव सत्य सिद्ध होंगे परन्तु मैं आपको वचन देती हूँ कि इस संसार में तो आपकी पुजा नही होगी परन्तु पुष्कर नगर में आपको बहुत ही श्रद्धा से पुजा जायेगा उनके इस वार्तालाप के पश्चात ब्रह्मा जी ने गायत्री द्वारा यज्ञ सम्पादन में दिए गये सहयोग से प्रसन्न होकर गायत्री जी वरदान दिया कि हे गायत्रे मै बहुत प्रसन्न हुँ तुम्हारे द्वारा यज्ञ सम्पादन में दिए गए सहयोग से सम्पुर्ण स्रष्टि का कल्याण होगा अतः मैं तुम्हें समुर्ण संगीत के सुर प्रदान करता हूँ तुम्हारे नाम से इस संसार में गायत्री मंत्र प्रचलित होगा जिसका चिंतन करने मात्र से विकट से विकट संकट दुर होगा! "
तब से गुर्जर समुदाय में सामुहीक रुप से जलाशय की तीर पर  पुर्वजो का श्राद्व किया जाता है जिंसे छांट कहा जाता है! '
         भँवरलाल गुर्जर
  एडवोकेट हिण्डोली बुन्दी राज.
(प्रदेश उपाध्यक्ष- राष्ट्रीय वीर गुर्जर महासभा राजस्थान)
मो. न. 9413128799
          9602252511

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