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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

साधु भूखा भाव का

साधु भूखा भाव का

BY - नारायण बारेठ (वरिष्ठ पत्रकार), जयपुर

साधु भूखा भाव का
धन का भूखा नहि
धन का भूखा जो फिरे सो तो साधु नाही।
कबीर बहुत ज्ञानी थे। आज होते तो ऐसा नहीं कहते।कहते तो ट्रोल हो जाते। 
समय परिवर्तनशील है।परिवर्तन के साथ पैमाने भी बदल जाते है।
पहले कोई गृहस्थ वैराग्य लेता। तपस्या करने कैलाश पर्वत तक जाता।बड़ा कष्टकारी मार्ग चुनता।अब ग्रेटर कैलाश जैसी बस्तियों में सब कुछ है।कष्ट तो अब गृहस्थ में है। रोजगार नहीं मिलता। मिल जाता है तो दफ्तर में दस झंझट। खेती करो तो फसल बर्बाद हो जाएगी या बाजार में मोल नहीं मिलेगा।परिवार पालना बड़ा कष्टकारी है।कदम कदम पर जिल्ल्त इंतजार करती मिलती है।मीडिया में हो तो जो कुछ हो रहा उसे लिख नहीं सकते। लिख दो तो रोजगार में टिक नहीं सकते।   
वक्त के साथ चीजे बदलती है।वैराग्य का तरीका भी बदलता है।पुराने दौर में इतने साधन नहीं थे। इसलिए धर्म का संदेश दूर तक नहीं पहुंच पाता था।अब जब साधन है तो क्यों नहीं इस्तेमाल होंगे। कबीर आज होते तो देख नहीं पाते। क्योकि कबीर  ने अपने दौर में ही मुल्ले मौलवियों और ऐसे साधु लोगो को खूब खरी खरी सुनाई थी । कहता था मुलना से मुर्गा भला ,सहर जगावे सुता। फिर कोई साधु दिख गया होगा ,कहने लगा साधु भैया तो का भया ,बुझा नहीं विवेक। छाप तिलक बनाई करि दग्धा लोग अनेक।            
पुराने दौर में  शासक भी ऐसे ही थे। उज्जैन में चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई  राजा भर्तहरि को जाने क्या सूझी सब कुछ छोड़ कर सन्यास ले लिया।  सब देखते रहे गए। राजा राज पाट छोड़ कर बीहड़ जंगलो में चला गया। ये तो पलायन है।पर समय के साथ चीजे बदलती है। हमारे एक पड़ोसी सूबे  में अभी पांच बाबाओ को मंत्री पद का दर्जा दिया गया है।इससे धर्म का प्रचार प्रसार करने में मदद मिलती है।बाबाओ ने सरकार से कुछ माँगा नहीं।वे मोह माया से दूर रहते है।लेकिन धर्म की जड़  हरी रहे। इसलिए स्वीकार कर लिया।      
कबीर अजीब आदमी था। यूँ ही टिप्पणियां करता रहता था। उसे पता था कि उसके वक्त  सोशल मीडिया नहीं है ।इसलिए  बनारस में गंगा जी घाट पर कुछ भी कह देता था । कोई ट्रोल नहीं कर सकता था ।  एक दिन तो यहाँ तक कह गया  ' फूटी आँखि  विवेक की ,लखे न संत असंत ,जाके  संग दस बीस ,ता का नाम महंत।

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