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मंगलवार, 29 मई 2018

कोई जलसा नहीं हुआ, दिन खामोशी से गुजर गया

कोई जलसा नहीं हुआ
दिन खामोशी से गुजर गया
वैसे भी वो  अपनी एक कविता में कह गए -
' "यश वैभव सुख की चाह नहीं, परवाह नहीं जीवन न रहे; यदि इच्छा है तो यह है-जग में स्वेच्छाचार दमन न रहे।" 
यह 1954 में 28 मई का दिन था जब जंगे आज़ादी के एक अहम किरदार विजय सिंह पथिक ने आखिरी सांस ली। कहाँ यूपी का बुलंदशहर और कहाँ राजस्थान का बिजोलिया। वे पैदा बुलंदशहर के गुठावली में हुए। लेकिन पथिक ने अपना जीवन राजस्थान को अर्पित कर दिया।वे कवि और पत्रकार भी थे।उस वक्त किसान जागीरदारी के लाग बाग़ बेगार लगान  जैसे अस्सी से ज्यादा करो से परेशान थे और ऊपर से अंग्रेज ने भी वसूली में कोई कसर नहीं छोड़ी।मेवाड़ के बिजोलिया क्षेत्र में पथिक जी ने किसानो को संगठित किया और ऐसा आंदोलन किया कि ब्रिटिश हुकूमत तिलमिला गई।आंदोलन कामयाब रहा। सरकार झुकी।
विजय सिंह पथिक  को वतनपरस्ती विरासत में मिली थी। उनके दादा इंद्र सिंह यूपी में मालगढ़ रियासत के दीवान थे।वे भी अंग्रेज से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और उनके पिता हमीर सिंह को गिरफ्तार किया गया था।पर वे राजस्थान क्यों आये ? क्योंकि अंग्रेज हुकूमत विजय सिंह पथिक को रास बिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल के साथ एक   षडंयत्र केस में तलाश रही थी।उस वक्त उनका नाम भूप सिंह गुर्जर था।इसके बाद ही विजय सिंह पथिक का अवतरण हुआ। पथिक को राजस्थान में खरवा के जागीरदार गोपाल सिंह के रूप में वैसा ही इंकलाबी साथी मिल गया जैसे वे खुद थे।वे शक्ति में एक और एक दो नहीं ग्यारह हो गए।दोनों ने मिल कर दो हजार नोजवानो की फौज खड़ी की और असलाह जमा किया। मगर किसी मुख़बिर ने अंग्रेज को खबर दे दी।वे गिरफ्तार हुए।उन्हें टाडगढ़ में रखा गया। तभी उन्हें लाहौर षडंयत्र केस में लाहौर ले जाने की बात आई। पर इससे पहले वे टाडग़ढ़ से निकल भगे।
   पथिक ने लिबास बदल लिया/ चितोड़ गढ़ को उनका नया कार्य क्षेत्र था । वहां साधु सीतारामदास उनसे बहुत  प्रभावित हुए।वे अलग किस्म के  साधु थे। साधु सीतारामदास किसानो की हालत से बहुत विचलित थे। उन्होंने ही पथिक को किसानो के नेतृत्व के लिए तैयार किया।फिर जबरदस्त किसान आंदोलन हुआ। वे गणेश शंकर विद्यार्थी के अख़बार प्रताप को किसान आंदोलन की खबरे भेजते थे। यह उनका ही प्रयास था तिलक ने अमृतसर कांग्रेस सम्मेलन में बिजोलिया आंदोलन पर  प्रस्ताव रखा। फिर वे वर्धा गए और जमनालाल बजाज की सहयोग से 'राजस्थान केसरी ' नामक अख़बार निकाला।गाँधी ने उन्हें सच्चा सिपाही बताकर तारीफ की।
        इसी इंकलाबी सफर के दौरान पथिक ने जानकी देवी से विवाह किया।जानकी जी के पति का निधन हो गया था। वे शिक्षक थी। जब पथिक जी जेल जाते ,वे टूशन कर घर चलाती।उनके क्रांतिकारी कार्यो की लम्बी फेहरिस्त है।सियासत भले ही भूल जाये। मगर इतिहास जमाने को उनकी कीर्ति गाथा सुनाता रहेगा।अभी एक दल अपनी सता बरकरार   रखने का जतन कर रहा है तो दूसरा सता में  लौटने को बेकरार है।  
जंगे आज़ादी के इस सेनानी को कोटि कोटि नमन - 
सादर
✒ नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता राजस्थान

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