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बुधवार, 2 मई 2018

गोपेन्द्र सिंह पावटा ने की मन की बात बयां

गुर्जर आरक्षण :मेरे मन की बात
दोस्तों ये हमारे हक की लड़ाई नूतन नही वरन् ये हमारा इतिहास पुराना है पता नही इतने आयोग बने इतनी सिफारिशे हुई इतना अध्ययन हुआ पर उनका लेख रह गया कुछ परिणाम नही आया ,,जब आरक्षण की बात राजस्थान में होती है तो लोग जान जाते है यह मुद्दा गुर्जरो का है पर मेरे दोस्त जब हमसे यह पूछते है की यह मुद्दा कब तक रहेगा तो जवाब सिफर हो जाता है,समाज का जीवन संगर्ष है यह निश्चित नही होना चाहिए है पर संघर्ष बना रहे यह उचित नही।क्योकि समाज को उन्नति की राह भी देखनी है पता नही जैसे जैसे गर्मियों आ जाती है आरक्षण जिन उभर के आ जाता है युवा रैली युवा आक्रोश ,आर पार, अंतिम बार ,एक बार,अब आखिरी बार, पर पता नही हम कैसे विद्वान बन बैठे है जो हक तक पहुंच ही नही पा रहे,क्योकि कहि न कहि यह मुद्दे को जाट आरक्षण के साथ जोड़ा जाए तो जब सम्मानीय विश्वेंद्र सिंह जी भरतपुर जाट आरक्षण की बात कर रहे थे और उस संदर्भ में धरने पर बैठे थे तब उनका जन्मदिवस उन दिनों में आया था जब SP और कलेक्टर उनके पास केक लेकर गए तो उन्होंने साफ मना कर दिया और कहा कि मेरे समाज का हक मिलने के बाद आपके साथ केक आपके दफ्तर में काटूँगा, वरना मेरा जन्मदिन हक मिलने तक नहीं मनाऊंगा न यहाँ से हटूंगा वहीं दूसरी तरफ हम लोग होटल तीज सरकारी होटलों के बार-बार दर्शन लाभ कर आते हैं मुझे लगता है  और मेरा मानना भी है कि जब तक हम हमारा हक नहीं पा लेते तब तक हमें सरकार का एक अन्न का दाना भी नहीं खाना चाहिए पर यह नेताओ को कौन समझाये,
हमें हमारा हक तरीके से लड़ना है और गैर समाजों के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए आगे बढ़ना है दोस्तों हम हर समाज के साथ लग जाते हैं पर हमारे साथ अन्य समाज खड़े इसलिए नहीं होते कि हर 6 महीने में हम लोग आरक्षण का जिन और जिंद वापस लेकर आ जाते हैं मिलना है या नहीं मिलना है बात यहां होनी चाहिए वैधानिक संविधान इन सब को ले तो यह सोचना चाहिए कि हमने आज तक लड़ाई कैसे लड़ी ।
मेरे जहन के कुछ सवालात :
1. हमने आरक्षण की लड़ाई  छात्रावास,छात्रवृत्ति  के लिए नहीं की थी !
2.हमारी मांग ST या ST के समकक्ष आरक्षण की थी!
3.क्या हमारी मांग MBC, OBC, SBC, थी!
4.हमारी मांग समाज के हक के लिए विकास की थी द्वीत्तीय व्यवस्था देवनारायण बोर्ड या कोई और मांग थी।समाज के लिए  प्रथम व्यवस्था आरक्षण थी
लेकिन ना हम अपनी बात पर टिके ना अपने ख्यालात पर रोज नयी मांग रोज नये सूत्र
5. क्या हमने हमारी लड़ाई इसलिए लड़ी थी की कि हमारे नौनिहालों का भविष्य हम कानून की बेड़ियों में जकड़ कर उनका भविष्य बर्बाद कर दें समाज को नई राह और नए रास्ता दिखाना है तो आरक्षण की लड़ाई एक बार लड़ कर अपने को साबित करना है अगर हम यही रोज हर बार कहते रहे तो लोगों की हंसी का पात्र बन जाते हैं कि मेरे भाई अबकी बार आखरी है ना ।अब कौन पूछे इन नेताओ से की आखरी बार है या मैच के बीच में बरसात आनी है।
6.मुझे डर है की अब गर आरक्षण की लड़ाई में वो लोग शिकार हो गए जिनके लिए आरक्षण माँगा जा रहा है तो फिर आरक्षण दोगे किसको।
7.बार बार प्रश्न यह भी आता है की इस लड़ाई को आप पकड़ो, या झोला आप पकड़ो पर प्रश्न यह नही होना चाहिए,,क्योकि कुर्बानी समाज ने आपके एक आदेश पर दे दी आगे भी देगा और देता रहेगा मगर आपको यह अंतर्मन से महसूस होना चाहिए कि क्या मैंने आज तक समाज के आरक्षण की लड़ाई उचित और अनुचित देखकर लड़ी है या फिर रोज नई-नई मांगो को लेकर।
8.हर बार घोषणा होती है की आरक्षण संघर्ष समिति भंग पर हर बार मीटिंग में वो ही क्यों।
9.अब हमारे समाज के प्रथम स्तर के नेताओ को सोचना चाहिए की कहि आपको आपकी गरिमा और सम्मान रखना है तो समाज को हासिये पर रखना छोड़ दो वरना हश्र आपका पडोसी नेता जैसा हो सकता है।
10 आप हर बार सामाजिक नेता और राजनेता की लड़ाई लड़ाने में मसगुल मत हो दोनों साथ बैठ कर लड़ाई लडो दोनों की मुछो की लड़ाई में समाज पिस रहा है
11.हर बार आरक्षण में हमे लोग हींन भावना से देखते है क्योकि रोज आंदोलनों से उपद्रवों से जनता ऊब चुकी है अब आपको इसका स्थाई समाधान ढूंढना चाहिये,मेरा मानना है की हमारा आरक्षण का मुद्दा राम मंदिर मुद्दा न बन जाये क्योकि ना राम मंदिर बन पा रहा है ना गुर्जर आरक्षण मिल पा रहा है।
12.आज इस बात को नही कहना चाहिए पर मन है कहूँगा की कर्नल साब अच्छे है समाज के सिरोधार्य है पर जब तक आप यु निर्णय करते रहोगे की
कर्नल साब बहुत अच्छे ,मजा बांध दिए आज तो भाषण में,आप के फैसले जो सोचते हो वो तो कोई सोच ही नही सकता,आप ने ये बात तो गजब कह दी तो गर ये चटुकार,फालतू के पुल बंधने वाले वाले पोल और पुल को हमेशा तहस नहस कर दते है
  सभी बुरे नही पर सच कहने वालो की विसेस कमी है गर युही चलता रहा तो हम गहरे बर्बादी के आलम में जाकर अन्य समाजो बहुत पीछे होंगे।।
( सभी का विशेष दिल से सम्मान करता हूं सभी मेरे अग्रज हैं पर कहीं इन बातों से किसी को ठेस या पीड़ा हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूं मगर जो लगा वह कहा फिर लिखा और किसी व्यक्तिगत आदमी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि मैंने किसी एक के लिए व्यक्तिगत लिखी है)कर्नल साब के प्रति मेरे दिल में विसेस सम्मान है पर सच तो सच ही है
"""'समाज की पीड़ा को समझता हूं इसलिए सच  लिखता हूं!"""'
आपके सुझाव के इन्तजार में
गोपेन्द्र सिंह पावटा
प्रदेशाध्यक्ष
अखिल भारतीय अखिल युवा गुर्जर महासभा
पार्षद
नगर परिषद हिण्डौन सिटी

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