गुरुवार, 9 मार्च 2017

22 मार्च (अंतरराष्ट्रीय गुर्जर दिवस) सम्पूर्ण गुर्जर समाज के शौर्य और स्वाभिमान का प्रतीक है: इसम सिंह चौहान


कहने या लिखने की आवश्यकता नहीं है कि निर्विवाद रूप से कहने या लिखने की आवश्यकता नहीं है कि निर्विवाद रूप से कसाणा गुर्जर सम्राट कनिष्क का राज्यरोहण दिवस ही सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय गुर्जर दिवस है। भारत सरकार ने इस दिवस को राजकीय संवत का दर्जा प्रदान किया हुआ है। आप को जान कर हर्ष होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि कि जब वे बतौर विदेश मंत्री अफगानिस्तान गये थे तो वहाँ के मुस्लिम गुर्जर समुदाय के लोगों ने बताया था कि शहंशाह कनिष्क कसाणा उन्हें और हिंदुस्तान के गुर्जर समुदाय को जोडता है। ज्ञातव्य हो कि 22 मार्च को भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय गुर्जर दिवस मनाया जा रहा है। जिस दिवस को भारत ही नहीं भारत से बाहर भी अंतर्राष्ट्रीय गुर्जर दिवस मनाया जाता है वही सही अंतरराष्ट्रीय गुर्जर दिवस है। ज्ञातव्य यह भी रहे कि भारत के राजाओं व महाराजाओं में एकमात्र कनिष्क ही इतने महान सम्राट हुए हैं जिनका साम्राज्य भारत की सीमाओं से बाहर चीन तिब्बत नेपाल व अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। जहां तक सम्राट मिहिरभोज का प्रश्न है वे निसंदेह हमारे सम्मान के पात्र हैं। हम मिहिभोज जयंती को राष्ट्रीय गुर्जर दिवस के रूप में सौल्लास मनाएं। गुर्जर सम्राट कनिष्क का राज्यरोहण दिवस ही सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय गुर्जर दिवस है। भारत सरकार ने इस दिवस को राजकीय संवत का दर्जा प्रदान किया हुआ है।
निवेदक
इसम सिंह चौहान
राष्ट्रीयअध्यक्ष: गुर्जर इतिहास शोध समिति

मंगलवार, 7 मार्च 2017

मिहिरकुल हूण और कल्कि अवतार

मिहिरकुल हूण और कल्कि अवतार
डा. सुशील भाटी

ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों की संकल्पना ग्यारहवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक अपना निश्चित आकार ले चुकी थी| भगवान विष्णु के दस अवतार माने जाते हैं- मतस्य, क्रुमु, वाराह, नरसिंह, वामन, पशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध ओर कल्कि|  पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार भगवान विष्णु के दस अवतारों में अंतिम हैं जोकि भविष्य में जन्म लेकर कलयुग का अंत करके सतयुग का प्रारंभ करेगा| अग्नि पुराण ने कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण किये हुए  एक घुडसवार के रूप में किया हैं| कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध ओर विजय के लिए निकलेगा तथा बोद्ध, जैन ओर म्लेछो को पराजित करेगा|
परन्तु कुछ पुराण ओर कवि कल्कि अवतार के लिए भूतकाल का प्रयोग करते हैं| वायु पुराण के अनुसार कल्कि अवतार कलयुग के चर्मौत्कर्ष पर जन्म ले चुका हैं| मतस्य पुराण, बंगाली कवि जयदेव (1200 ई.) ओर चंडीदास के अनुसार भी कल्कि अवतार की घटना हो चुकी हैं| अतः कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हो सकता हैं|

जैन पुराणों में भी एक कल्कि नामक भारतीय सम्राट का वर्णन हैं| जैन विद्वान गुणभद्र नवी शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखता हैं कि कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के एक हज़ार वर्ष बाद हुआ| जिन सेन ‘उत्तर पुराण’ में लिखता हैं कि कल्किराज ने 40 वर्ष राज किया और 70 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई|  कल्किराज अजितान्जय का पिता था, वह बहुत निरंकुश शासक था, जिसने दुनिया का दमन किया और निग्रंथो के जैन समुदाय पर अत्याचार किये| गुणभद्र के अनुसार उसने दिन में एक बार दोपहर में भोजन करने वाले जैन निग्रंथो के भोजन पर भी टैक्स लगा दिया जिससे वो भूखे मरने लगे | तब निग्रंथो को कल्कि की क्रूर यातनाओ से बचाने के लिए एक दैत्य का अवतरण हुआ जिसने वज्र (बिजली) के प्रहार से उसे मार दिया ओर अनगिनत युगों तक असहनीय दर्द ओर यातनाये झेलने के लिए रत्नप्रभा नामक नर्क में भेज दिया|

प्राचीन जैन ग्रंथो के वर्णनों के अनुसार कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं जिसका शासनकाल महावीर की मृत्यु (470 ईसा पूर्व) के एक हज़ार साल बाद, यानि कि गुप्तो के बाद, छठी शताब्दी ई. के प्रारभ में, होना चाहिए चाहिए| गुप्तो के बाद अगला शासन हूणों का था| जैन ग्रंथो में वर्णित कल्कि का समय और कार्य हूण सम्राट मिहिरकुल के साथ समानता रखते हैं| अतः कल्कि राज ओर मिहिरकुल (502- 542 ई.) के एक होने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता| इतिहासकार के. बी. पाठक ने सम्राट मिहिरकुल हूण की पहचान कल्कि के रूप में की हैं, वो कहते हैं कि कल्किराज मिहिरकुल को दूसरा नाम है|

जैन ग्रंथो ने कल्किराज के उत्तराधिकारी का नाम अजितान्जय बताया हैं| मिहिरकुल हूण के उत्तराधिकारी का नाम भी अजितान्जय था|

चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु हेन सांग मिहिरकुल की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष बाद भारत आया| उसके द्वारा लिखित सी यू की नामक वृतांत इस मामले में कुछ और प्रकाश डालता हैं| वह कहता हैं कि मिहिरकुल कि मृत्यु के समय भयानक तूफ़ान आया और ओले बरसे, धरती कांप उठी तथा चारो ओर गहरा अँधेरा छा गया| बौद्ध पवित्र संतो ने कहा कि अनगिनत लोगो को मारने ओर बुध के धर्म को उखाड फेकने के कारण मिहिरकुल गहरे नर्क में जा गिरा जहाँ वह अंतहीन युगों तक सजा भोगता रहेगा|  जैन धर्म पर प्रहार करने वाले निरंकुश कल्कि के गहरे नर्क में जाने ओर अनगिनत युगों तक दुःख ओर यातनाये झेलने का वर्णन,  बौद्ध धर्म पर प्रहार करने वाले निरंकुश मिहिरकुल के नर्क में गिरने के वर्णन से बहुत मेल खाता हैं| अतः जैन ग्रन्थ में वर्णित कल्कि राज के मिहिरकुल होने की सम्भावना प्रबल  हैं|
ब्राह्मण ग्रन्थ अग्नि पुराण ने कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण करने वाला एक घुडसवार के रूप में किया हैं| कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध ओर विजय के लिए निकलेगा तथा  बोद्ध, जैन ओर म्लेछो को पराजित कर धर्म (ब्राह्मण/हिंदू धर्म) की पुनर्स्थापना करेगा|  इतिहास में हूण कल्कि की तरह श्रेष्ठ घुडसवार ओर धनुर्धर के रूप में विख्यात हैं तथा  कल्किराज/  मिहिरकुल हूण ने भी कल्कि की तरह  जैन  ओर बोद्ध धर्म के अनुयायियों का दमन किया था|  कश्मीरी ब्राह्मण विद्वान कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था| कल्हण ने राजतरंगिणी नामक ग्रन्थ में मिहिरकुल का वर्णन ब्राह्मण समर्थक शिव भक्त के रूप में किया हैं| कल्हण कहता हैं कि मिहिरकुल ने कश्मीर में मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया ओर ब्राह्मणों को 700 गांव (अग्रहार) दान में दिए| हूणों के शासन से पहले कश्मीर ही नहीं वरन पूरे भारत में बौद्ध धर्म प्रबल था| भारत में बौद्ध धर्म के अवसान ओर ब्राह्मण धर्म के संरक्षण एवं विकास में मिहिरकुल हूण की एक प्रमुख भूमिका हैं|
केम्पबैल के अनुसार राजतरंगिणी और सी यू  की में दिए गए मिहिरकुल के वर्णन से ऐसा लगता हैं कि उसे भगवान समझा जाता था| उसका चित्रण एक धार्मिक यौद्धा के रूप में हुआ हैं जिसकी शक्ति और सफलताए भगवान जैसी हैं|
मिहिरकुल की संगति कल्कि अवतार के साथ करने में एक कठनाई ये हैं कि कुछ इतिहासकार हूणों को विधर्मी संस्कृति का विदेशी आक्रांता मानते हैं| किन्तु हूणों को विधर्मी ओर विदेशी नहीं कहा जा सकता हैं| ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार हारा हूण (किदार कुषाण) लगभग 360 ई. में भारत के पश्चिमीओत्तर में स्थापित राजनेतिक शक्ति थे| श्वेत हूण भी पांचवी शताब्दी में पश्चिमीओत्तर भारत के शासक थे| 500 ई. लगभग जब तोरमाण ओर मिहिरकुल के नेतृत्व में जब हूणों ने मध्य भारत में साम्राज्य स्थापित किया तब वो ब्राह्मण संस्कृति ओर धर्म का एक हिस्सा थे, जबकि गुप्त सम्राट बालादित्य बौद्ध धर्म का अनुयायी था| अतः हूणों ओर गुप्तो टकराव राजनैतिक सर्वोच्चता ओर साम्राज्य के लिए दो भारतीय ताकतों का संघर्ष था| भारत के प्रथम हूण सम्राट तोरमाण के शासन काल के पहले ही वर्ष का अभिलेख मध्य भारत के एरण नामक स्थान से वाराह मूर्ति से मिला हैं| हूणों के कबीलाई देवता वाराह का सामजस्य भगवान विष्णु के वाराह अवतार के साथ कर उसे ब्राह्मण धर्म में अवशोषित किया जा चुका था|  कालांतर में हूणों से सम्बंधित माने जाने वाले गुर्जरों के प्रतिहार वंश ने मिहिर भोज के नेतृत्व में उत्तर भारत में अंतिम हिंदू साम्राज्य का निर्माण किया ओर ब्राह्मण संस्कृति के संरक्षण में हूणों जैसी प्रभावी भूमिका निभाई| गुर्जर प्रतिहारो की राजधानी कन्नौज संस्कृति का उच्चतम केंद्र होने के कारण महोदय कहलाती थी|  तोरमाण हूण के तरह गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज भी वाराह का उपासक था ओर उसने आदि वाराह की उपाधि भी धारण की थी| संभवतः आम समाज के द्वारा मिहिरभोज को भगवान विष्णु का वाराह अवतार माना जाता था| गुर्जर- प्रतिहारो ने सातवी शताब्दी से लेकर दसवी शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियों से भारत ओर उसकी संस्कृति की जो रक्षा की उससे सभी इतिहासकार परिचित हैं| समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने गुर्जर सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु कहा हैं| मिहिरभोज ने आदि वाराह की उपाधि आर्य धर्म ओर संस्कृति के रक्षक होने के नाते ही धारण की थी| मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को उसके गुरु राजशेखर ने आर्यवृत का सम्राट कहा हैं|  गुर्जर सभवतः हूणों ओर कुषाणों की नयी पहचान थी|
अतः हूणों ओर उनके वंशज गुर्जरों ने ब्राह्मण/हिंदू धर्म ओर संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस कारण से इनके सम्राट मिहिरकुल हूण ओर मिहिरभोज गुर्जर को समकालीन ब्राह्मण/हिंदू समाजो द्वारा अवतारी पुरुष के रूप में देखा गया हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं हैं|

सन्दर्भ

1. भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्त्रोत, नई दिल्ली, 1991,
2. रेखा चतुर्वेदी भारत में सूर्य पूजा-सरयू पार के विशेष सन्दर्भ में (लेख) जनइतिहास शोध पत्रिका, खंड-1 मेरठ, 2006
3. ए. कनिंघम आरकेलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, 1864
4. के. सी.ओझा, दी हिस्ट्री आफ फारेन रूल इन ऐन्शिऐन्ट इण्डिया, इलाहाबाद, 1968 
5. डी. आर. भण्डारकर, फारेन एलीमेण्ट इन इण्डियन पापुलेशन (लेख), इण्डियन ऐन्टिक्वैरी खण्डX L 1911
6. ए. एम. टी. जैक्सन, भिनमाल (लेख), बोम्बे गजेटियर खण्ड 1 भाग 1, बोम्बे, 1896
7. विन्सेंट ए. स्मिथ, दी ऑक्सफोर्ड हिस्टरी ऑफ इंडिया, चोथा संस्करण, दिल्ली,
8. जे.एम. कैम्पबैल, दी गूजर (लेख), बोम्बे गजेटियर खण्ड IX भाग 2, बोम्बे, 1899
9.के. सी. ओझा, ओझा निबंध संग्रह, भाग-1 उदयपुर, 1954
10.बी. एन. पुरी. हिस्ट्री ऑफ गुर्जर-प्रतिहार, नई दिल्ली, 1986
11. डी. आर. भण्डारकर, गुर्जर (लेख), जे.बी.बी.आर.एस. खंड 21, 1903
12 परमेश्वरी लाल गुप्त, कोइन्स. नई दिल्ली, 1969
13. आर. सी मजुमदार, प्राचीन भारत
14. रमाशंकर त्रिपाठी, हिस्ट्री ऑफ ऐन्शीएन्ट  इंडिया, दिल्ली, 1987

22 मार्च को अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस के रूप में क्यों मनाये?

22 मार्च को अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस के रूप में क्यों मनाये ?
डा. सुशील भाटी
1 गुर्जर इस मायने में एक अंतराष्ट्रीय समुदाय हैं कि यह अज्ञात काल से भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और कुछ मध्य एशियाई देशो में निवास कर रहा हैं| क्योकि गुर्जर एक अंतराष्ट्रीय समुदाय हैं तो इसका एक अंतराष्ट्रीय दिवस भी होना चाहिये|
2 ऐतिहासिक तोर पर कनिष्क द्वारा स्थापित कुषाण साम्राज्य गुर्जर कौम का प्रतिनिधित्व करता हैं| यह साम्राज्य भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि उन सभी देशो में फैला हुआ था जहाँ आज गुर्जर रहते हैं| कुषाण साम्राज्य की एक राजधानी मथुरा, भारत में तथा दूसरी पेशावर, पाकिस्तान में थी| तक्षशिला और बेग्राम, अफगानिस्तान में इसकी अन्य राजधानी थी|
3 मशहूर पुरात्वेत्ता एलेग्जेंडर कनिंघम इतिहास प्रसिद्ध कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की हैं| उनके अनुसार गुर्जरों का कसाना गोत्र कुषाणों का वर्तमान प्रतिनिधि हैं|
4 कनिष्क के साम्राज्य का एक अंतराष्ट्रीय महत्व हैं, दुनिया भर के इतिहासकार इसमें अकादमिक रूचि रखते हैं| प्राचीन काल  का अंतराष्ट्रीय व्यापर मार्ग जिसे रेशम मार्ग कहा जाता था कुषाणों के नियंत्रण में था गुर्जरों के पूर्वजों अर्थात कुषाण परिसंघ के लोगो ने अपने साम्राज्य में एक सार्वदेशिक संस्कृति का पोषण किया | कुषाण साम्राज्य के अतरिक्त गुर्जरों से सम्बंधित कोई अन्य साम्राज्य नहीं हैं जोकि पूरे दक्षिणी एशिया में फैले गुर्जर समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इससे अधिक उपयुक्त हो| यहाँ तक की मिहिर भोज द्वारा स्थापित प्रतिहार साम्राज्य केवल उत्तर भारत तक सीमित था तथा पश्चिमिओत्तर में करनाल इसकी बाहरी सीमा थी|
5 अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार कनिष्क ने अपने राज्य रोहण के अवसर पर 78 ईस्वी में शक संवत प्रारम्भ किया| शक संवत प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को आरम्भ होता हैं, अतः 22 मार्च कनिष्क के राज्य रोहण की तिथि हैं| दक्षिणी एशिया विशेष रूप से गुर्जरों के के प्राचीन इतिहास में यह एक मात्र तिथि हैं जिसे अंतराष्ट्रीय रूप से मान्य पूरी दुनिया में प्रचलित जूलियन कलेंडर  के हिसाब से निश्चित किया जा सकता हैं| अतः अन्य पंचांगों पर आधारित तिथियों की विपरीत यह भारत, पाकिस्तान अफगानिस्तान अथवा अन्य जगह जहा भी गुर्जर निवास करते हैं यह एक  ही रहेगी|
6 गुर्जरों का पूर्वज कनिष्क ने एक सार्वदेशिक संस्कृति से संपन्न अंतराष्ट्रीय साम्राज्य का स्वामी था| कनिष्क का इतिहास आज भी दुनिया भर के इतिहाकारो को आकर्षित करता हैं| कनिष्क की आज भी एक अंतराष्ट्रीय पहचान हैं| अतः कनिष्क के राज्य रोहण की तिथि 22 मार्च अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस मनाने के लिए उपयुक्त हैं|

Why Gurjars should celebrate 22 March as The International Gurjar Day

Why Gurjars should celebrate 22 March as The International Gurjar Day
Dr SushilBhati
1. Gurjara is an international community in the sense that they have been living in many countries like India, Pakistan, Afghanistan, Iran and some Central Asian countries from time immemorial. As we are an international community we should have ainternatonal day.
2. Historically, Kushana Empire under Kanishka represents the Gujar community. It covered many modern nations particularly those where the Gujars lives today i.e. India, Pakistan and Afghanistan. Peshawar in Pakistan and Mathura in India were his main Capitals, other Capitals being Takshila and Begram (Afghanistan). Noted archaeologist Alexander Cunningham identified Kushanas with modern Gujars. He considered modern Kasana clan of Gujars as representative of Kushanas.
3. Kanishka’s Empire has an International importance and Historians from all parts of world take academic interest in it. International trade route of the times, the silk route, was under the control of Kushanas. The ancestors of Gujars, the people of Kushana confederation under Kanishka nurtured a cosmopolitan culture throughout their vast empire. No other empire pertaining to Gujars beside Kushana qualifies as international empire and can be claimed to represent the whole Gurjar population spread over the whole south asia. Even Pratihara Empire under MihirBhoj was limited to Northern India and it did not extended beyond Karnal district in North-Western direction.
4. According to the majority of historian kanishka started the Saka era when he ascended the throne in 78 A D. The Saka era starts on 22 March every year. Thus, 22 March is the date of accession of kanishka. This is the only date in ancient History of South Asia particularly that of Gujars which can be fixed according to the internationally prevalent Julian Calendar functional in all parts of the world. Unlike dates based on other calendar it is same everywhere in India or Pakistan or Afghanistan or any other part where Gurjars reside.
Kanishka, the ancestor of modern Gujars held an international empire with a cosmopolitan culture. Kanishka still has an international appeal. His accession day, 22 March, seems suitable to be celebrated as “International Gurjar Day”.

Why Gurjars should celebrate 22 March as The International Gurjar Day

Why Gurjars should celebrate 22 March as The International Gurjar Day
Dr SushilBhati
1. Gurjara is an international community in the sense that they have been living in many countries like India, Pakistan, Afghanistan, Iran and some Central Asian countries from time immemorial. As we are an international community we should have ainternatonal day.
2. Historically, Kushana Empire under Kanishka represents the Gujar community. It covered many modern nations particularly those where the Gujars lives today i.e. India, Pakistan and Afghanistan. Peshawar in Pakistan and Mathura in India were his main Capitals, other Capitals being Takshila and Begram (Afghanistan). Noted archaeologist Alexander Cunningham identified Kushanas with modern Gujars. He considered modern Kasana clan of Gujars as representative of Kushanas.
3. Kanishka’s Empire has an International importance and Historians from all parts of world take academic interest in it. International trade route of the times, the silk route, was under the control of Kushanas. The ancestors of Gujars, the people of Kushana confederation under Kanishka nurtured a cosmopolitan culture throughout their vast empire. No other empire pertaining to Gujars beside Kushana qualifies as international empire and can be claimed to represent the whole Gurjar population spread over the whole south asia. Even Pratihara Empire under MihirBhoj was limited to Northern India and it did not extended beyond Karnal district in North-Western direction.
4. According to the majority of historian kanishka started the Saka era when he ascended the throne in 78 A D. The Saka era starts on 22 March every year. Thus, 22 March is the date of accession of kanishka. This is the only date in ancient History of South Asia particularly that of Gujars which can be fixed according to the internationally prevalent Julian Calendar functional in all parts of the world. Unlike dates based on other calendar it is same everywhere in India or Pakistan or Afghanistan or any other part where Gurjars reside.
Kanishka, the ancestor of modern Gujars held an international empire with a cosmopolitan culture. Kanishka still has an international appeal. His accession day, 22 March, seems suitable to be celebrated as “International Gurjar Day”.

अंतरराष्ट्रीय गुर्जर दिवस (22 मार्च - नव शक संवत्सर)

अन्तराष्ट्रीय गुर्जर दिवस (२२ मार्च - नव शक संवत्सर)
                                            
डा. सुशील भाटी

गुर्जर इस मायने में एक अन्तराष्ट्रीय समुदाय हैं कि यह भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के कुछ देशो में अविस्मरणीय काल से रहते आ रहा हैं| इनका इतिहास ईसा की पहली तीन शताब्दियों (0- 300 ईस्वी) के कुषाण साम्राज्य काल तक जाता हैं| कुषाणों में कनिष्क सबसे प्रतापी सम्राट हुआ हैं जिसने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया| कनिष्क के साम्राज्य में लगभग वो सभी देश आते थे जहाँ आज गुर्जरो की आबादिया हैं| उसका साम्राज्य मध्य एशिया स्थित काला सागर से लेकर पूर्व में उडीसा तक तथा उत्तर में चीनी तुर्केस्तान से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैला हुआ था| उसके साम्राज्य में वर्तमान उत्तर भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान का एक हिस्सा, तजाकिस्तान का हिस्सा और चीन के यारकंद, काशगर और खोतान के इलाके थे| कनिष्क भारतीय इतिहास का एक मात्र सम्राट हैं जिसका राज्य दक्षिणी एशिया के बाहर मध्य एशिया और चीन के हिस्सों को समाये हुएथा| वह इस साम्राज्य पर चार राजधानियो से शासन करता था| आधुनिक पाकिस्तान स्थित पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) उसकी मुख्य राजधानी थी| मथुरा (भारत), तक्षशिला और बेग्राम (अफगानिस्तान) उसकी अन्य राजधानिया थी|

कनिष्क के राज्य काल में भारत में व्यापार और उद्योगों में अभूतपूर्व तरक्की हुई क्योकि मध्य एशिया स्थित रेशम मार्ग, जोकि समकालीन अंतराष्ट्रीय व्यापार मार्ग था तथा  जिससे यूरोप और चीन के बीच रेशम का व्यापार होता था, पर कनिष्क का कब्ज़ा था| भारत के बढते व्यापार और आर्थिक उन्नति के इस काल में तेजी के साथ नगरीकरण हुआ| इस समय पश्चिमिओत्तर भारत में करीब 60 नए नगर बसे और पहली बार भारत में कनिष्क ने ही बड़े पैमाने सोने के सिक्के चलवाए|

कनिष्क के विशाल अंतराष्ट्रीय साम्राज्य में हमें सार्वदेशिक संस्कृति का विकास देखने को मिलता हैं| कुषाण/कसाना समुदाय एवं उनका नेता कनिष्क मिहिर (सूर्य) और अतर (अग्नि) के उपासक थे| उसके विशाल साम्राज्य में विभिन्न धर्मो और रास्ट्रीयताओं के लोग रहते थे| किन्तु कनिष्क धार्मिक दृष्टीकोण से बेहद उदार था, उसके सिक्को पर हमें भारतीय, ईरानी-जुर्थुस्त और ग्रीको-रोमन देवी देवताओं के चित्र मिलते हैं|  कनिष्क ने बोद्ध धर्म को भी संगरक्षण प्रदान किया|

कनिष्क ने शक संवत के नाम से एक नए संवत शरू किया जो आज भी भारत में चल रहा हैं|शक संवत संवत को सम्राट कनिष्क ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में 78 ईस्वी में चलाया था| इस संवत कि पहली तिथि चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (22 मार्च) होती हैं जोकि विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान के राज्य रोहण की वर्ष गाठ हैं|

प्राचीन काल में यह संवत भारत में सबसे अधिक प्रयोग किया जाता था| भारत में शक संवत का व्यापक प्रयोग अपने प्रिय सम्राट के प्रति प्रेम और आदर का सूचक हैं और उसकी कीर्ति को अमर करने वाला हैं| प्राचीन भारत के महानतम ज्योतिषाचार्य वाराहमिहिर (500 इस्वी) और इतिहासकार कल्हण (1200 इस्वी) अपने कार्यों में शक संवत का प्रयोग करते थे| उत्तर भारत में कुषाणों और शको के अलावा गुप्त सम्राट भी मथुरा के इलाके में शक संवत का प्रयोग करते थे| दक्षिण के चालुक्य और राष्ट्रकूट और राजा भी अपने अभिलेखों और राजकार्यो में शक संवत का प्रयोग करते थे|

शक संवत भारतीय संवतो में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, सही तथा त्रुटिहीन हैं| शक संवत भारत सरकार द्वारा कार्यलीय उपयोग लाया जाना वाला अधिकारिक संवत हैं| शक संवत का प्रयोग भारत के ‘गज़ट’ प्रकाशन और ‘आल इंडिया रेडियो’ के समाचार प्रसारण में किया जाता हैं| भारत सरकार द्वारा ज़ारी कैलेंडर, सूचनाओ और संचार हेतु भी शक संवत का ही प्रयोग किया जाता हैं| शक संवत भारत का राष्ट्रीय संवत हैं|

आर्केलोजिकल सर्वे आफ इंडिया के पहले महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिघंम ने आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट 1864 में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है और उसने माना है कि गुर्जरों के कसाना गौत्र के लोग कुषाणों के वर्तमान प्रतिनिधि है। उसकी बात का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि गुर्जरों का कसाना गोत्र क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से सबसे बड़ा है। कसाना गौत्र अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैला है और भारत में केवल गुर्जर जाति में मिलता है।

गुर्जरों के सबसे पहले राज्य “गुर्जर देश” की राजधानी भिनमाल के इतिहास से कुषाण सम्राट कनिष्क के साथ एक गहरा नाता हैं| जिससे गुर्जरों को कुषाणों से जोड़ा जाना सही साबित होता हैं| सातवी शताब्दी में भारत में गुर्जरों की राजनैतिक शक्ति का उभार हुआ| उस समय आधुनिक राजस्थान गुर्जर देश कहलाता था| इसकी राजधानी दक्षिणी राजस्थान में स्थित भिनमाल थी| भिनमाल के विकास में कनिष्क का बहुत बड़ा योगदान था| प्राचीन भिनमाल नगर में सूर्य देवता के प्रसिद्ध जगस्वामी मन्दिर का निर्माण काश्मीर के राजा कनक (सम्राट कनिष्क) ने कराया था। मारवाड़ एवं उत्तरी गुजरात कनिष्क के साम्राज्य का हिस्सा रहे थे। कनिष्क ने वहाँ ‘करडा’ नामक झील का निर्माण भी कराया था। भिनमाल से सात कोस पूर्व ने कनकावती नामक नगर बसाने का श्रेय भी कनिष्क को दिया जाता है। कहते है कि भिनमाल के वर्तमान निवासी देवडा लोग एवं श्रीमाली ब्राहमण कनक (कनिष्क) के साथ ही काश्मीर से आए थे। देवड़ा लोगों का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होंने जगस्वामी सूर्यदेव का मन्दिर बनाया था। राजा कनक से सम्बन्धित होने के कारण उन्हें सम्राट कनिष्क की देवपुत्र उपाधि से जोड़ना गलत नहीं होगा।

गुर्जरों के पूर्वज कनिष्क ने एक अंतराष्ट्रीय साम्राज्य का निर्माण किया और वहाँ एक सार्वदेशिक संस्कृति (Cosmopolitan culture) का विकास किया| आज भी कनिष्क के व्यक्तित्व और कुषाण साम्राज्य की विश्व में एक पहचान हैं, अतः कनिष्क के राज्य रोहण दिवस २२ मार्च को अंतराष्ट्रीय गुर्जर दिवस के रूप में मनाया जाना उचित हैं|

सन्दर्भ

1. भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्त्रोत, नई दिल्ली, 1991,
2. रेखा चतुर्वेदी भारत में सूर्य पूजा-सरयू पार के विशेष सन्दर्भ में (लेख) जनइतिहास शोध पत्रिका, खंड-1 मेरठ, 2006
3. ए. कनिंघम आरकेलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, 1864
4. के. सी.ओझा, दी हिस्ट्री आफ फारेन रूल इन ऐन्शिऐन्ट इण्डिया, इलाहाबाद, 1968 
5. डी. आर. भण्डारकर, फारेन एलीमेण्ट इन इण्डियन पापुलेशन (लेख), इण्डियन ऐन्टिक्वैरी खण्ड X L 1911
6. जे.एम. कैम्पबैल, भिनमाल (लेख), बोम्बे गजेटियर खण्ड 1 भाग 1, बोम्बे, 1896
7. विन्सेंट ए. स्मिथ, दी ऑक्सफोर्ड हिस्टरी ऑफ इंडिया, चोथा संस्करण, दिल्ली, 1990